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Tuesday, November 12, 2019

भारत की आज़ादी का असली इतिहास By Rajiv Dixit Ji


आखिर इतना बड़ा भारत मूठी भर अंग्रेज़ो का गुलाम कैसे हुआ ?? किसी इतिहास की किताब आपको ये जवाब नहीं मिलेगा ! एक बार पढ़ें ! राजीव भाई की भाषा मे (1998 ) — दो तीन गंभीर बाते कहने आपसे आया हूँ . और चाहता हु कि कुछ आपसे कह सकुं और अगर आप चाहें तो मुझसे कुछ पूछ सके. मेरे व्याख्यान के बाद अगर आपको लगे तो आप सवाल जरुर पूछिएगा. जिस विषय पर मै व्याख्यान देने वाला हूँ वो विषय आज हमारे देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, इसलिए अगर आप उसमे कुछ सवाल करेंगे तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी. आज़ादी के 50 साल हो गए है, ऐसा भारत सरकार कहती है. 1947 में हम आजाद हुए थे, अंग्रेजो की गुलामी से. और 1947 में जब आज़ादी मिली, तो अब 1998 आ गया है, ऐसा माना जाता है कि 500 साल पुरे हो गए, देश को आज़ाद हुए. मै मानता हु कि ये आज़ादी के ५० साल नही है बल्कि हिंदुस्तान की गुलामी के 500 साल पुरे हुए है. ये, कभी कभी आपको आश्चर्य लगेगा कि ये राजीव भाई ऐसा क्यों बोलते है गुलामी के 500 साल ?? भारत सरकार तो कहती है कि आज़ादी को 50 साल हो गए है. और मै बहुत गंभीरता से ये मानता हु कि आज़ादी के 50 साल नहीं बल्कि गुलामी के 400 साल पुरे हुए है. वो कैसे? उसको समझिए,

इस विडियो में देखिए भारत की आजादी का असली इतिहास >>

आज से लगभग 400 साल पहले, वास्कोडीगामा आया था हिंदुस्तान. इतिहास की चोपड़ी में, इतिहास की किताब में हमसब ने पढ़ा होगा कि सन. 1498 में मई की 20 तारीख को वास्कोडीगामा हिंदुस्तान आया था. इतिहास की चोपड़ी में हमको ये बताया गया कि वास्कोडीगामा ने हिंदुस्तान की खोज की, पर ऐसा लगता है कि जैसे वास्कोडीगामा ने जब हिंदुस्तान की खोज की, तो शायद उसके पहले हिंदुस्तान था ही नहीं. हज़ारो साल का ये देश है, जो वास्कोडीगामा के बाप दादाओं के पहले से मौजूद है इस दुनिया में. तो इतिहास कि चोपड़ी में ऐसा क्यों कहा जाता है कि वास्कोडीगामा ने हिंदुस्तान की खोज की, भारत की खोज की. और मै मानता हु कि वो एकदम गलत है. वास्कोडीगामा ने भारत की कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान की भी कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान पहले से था, भारत पहले से था,

वास्कोडीगामा यहाँ आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए, एक बात और जो इतिहास में, मेरे अनुसार बहुत गलत बताई जाती है कि वास्कोडीगामा एक बहूत बहादुर नाविक था, बहादुर सेनापति था, बहादुर सैनिक था, और हिंदुस्तान की खोज के अभियान पर निकला था, ऐसा कुछ नहीं था, सच्चाई ये है कि पुर्तगाल का वो उस ज़माने का डॉन था, माफ़िया था. जैसे आज के ज़माने में हिंदुस्तान में बहूत सारे माफ़िया किंग रहे है, उनका नाम लेने की जरुरत नहीं है, क्योकि मंदिर की पवित्रता ख़तम हो जाएगी, ऐसे ही बहूत सारे डॉन और माफ़िया किंग 15 वी सताब्दी में होते थे यूरोप में. और 15 वी. सताब्दी का जो यूरोप था, वहां दो देश बहूत ताकतवर थें उस ज़माने में, एक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल. तो वास्कोडीगामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था. 1490 के आस पास से वास्को डी गामा पुर्तगाल में चोरी का काम, लुटेरे का काम, डकैती डालने का काम ये सब किया करता था. और अगर सच्चा इतिहास उसका आप खोजिए तो एक चोर और लुटेरे को हमारे इतिहास में गलत तरीके से हीरो बना कर पेश किया गया. और ऐसा जो डॉन और माफ़िया था उस ज़माने का पुर्तगाल का ऐसा ही एक दुसरा लुटेरा और डॉन था, माफ़िया था उसका नाम था कोलंबस, वो स्पेन का था.

तो हुआ क्या था, कोलंबस गया था अमेरिका को लुटने के लिए और वास्कोडीगामा आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए. लेकिन इन दोनों के दिमाग में ऐसी बात आई कहाँ से, कोलंबस के दिमाग में ये किसने डाला की चलो अमेरिका को लुटा जाए, और वास्कोडीगामा के दिमाग में किसने डाला कि चलो भारतवर्ष को लुटा जाए. तो इन दोनों को ये कहने वाले लोग कौन थे? अतुल भाई जो बता रहे थे, वही बात मै आपसे दोहरा रहा हु.
हुआ क्या था कि 14 वी. और 15 वी. सताब्दी के बीच का जो समय था, यूरोप में दो ही देश थें जो ताकतवर माने जाते थे, एक देश था स्पेन, दूसरा था पुर्तगाल, तो इन दोनों देशो के बीच में अक्सर लड़ाई झगडे होते थे, लड़ाई झगड़े किस बात के होते थे कि स्पेन के जो लुटेरे थे, वो कुछ जहांजो को लुटते थें तो उसकी संपत्ति उनके पास आती थी, ऐसे ही पुर्तगाल के कुछ लुटेरे हुआ करते थे वो जहांज को लुटते थें तो उनके पास संपत्ति आती थी, तो संपत्ति का झगड़ा होता था कि कौन-कौन संपत्ति ज्यादा रखेगा. स्पेन के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी या पुर्तगाल के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी. तो उस संपत्ति का बटवारा करने के लिए कई बार जो झगड़े होते थे वो वहां की धर्मसत्ता के पास ले जाए जाते थे. और उस ज़माने की वहां की जो धर्मसत्ता थी, वो क्रिस्चियनिटी की सत्ता थी, और क्रिस्चियनिटी की सत्ता 1492 में के आसपास पोप होता था जो सिक्स्थ कहलाता था, छठवा पोप.!

तो एक बार ऐसे ही झगड़ा हुआ, पुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओ के बीच में, और झगड़ा किस बात को ले कर था? झगड़ा इस बात को ले कर था कि लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए. तो उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया. आदेश जारी किया, एक नोटिफिकेशन जारी किया. सन 1492 में, और वो नोटिफिकेशन क्या था? वो नोटिफिकेशन ये था कि 1492 के बाद, सारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटा, और दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा. तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम स्पेन करेगा. ये आदेश 1492 में पोप ने जारी किया. ये आदेश जारी करते समय, जो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बांटे, और उन दोनों हिस्सों को लुटने के लिए दो अलग अलग देशो की नियुक्ति कर दे? स्पैन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटो, पुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो और 1492 में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एग्जिस्ट करता है.

ये क्रिस्चियनिटी की धर्मसत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है उसका एक अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने मान लिया कि सारी दुनिया तो हमारी है और इस दुनिया को दो हिस्सों में बांट दो पुर्तगाली पूर्वी हिस्से को लूटेंगे, स्पेनीश लोग पश्चिमी हिस्से को लूटेंगे. पुर्तगालियो को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लुटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लुट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया था. क्योकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है. और उसी लुट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया. इतिहास बताता है कि 1492 में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और 1498 में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचा, भारतवर्ष पहुंचा. कोलंबस जब अमरीका पहुंचा तो उसने अमरीका में, जो मूल प्रजाति थी रेड इंडियन्स जिनको माया सभ्यता के लोग कहते थे, उन माया सभ्यता के लोगों से मार कर पिट कर सोना चांदी छिनने का काम शुरु किया. इतिहास में ये बराबर गलत जानकारी हमको दी गई कि कोलंबस कोई महान व्यक्ति था, महान व्यक्ति नहीं था, अगर गुजरती में मै शब्द इस्तेमाल करू तो नराधम था. और वो किस दर्जे का नराधम था, सोना चांदी लुटने के लिए अगर किसी की हत्या करनी पड़े तो कोलंबस उसमे पीछे नहीं रहता था,

उस आदमी ने 14 – 15 वर्षो तक बराबर अमेरीका के रेड इन्डियन लोगों को लुटा, और उस लुट से भर – भर कर जहांज जब स्पेन गए तो स्पेन के लोगों को लगा कि अमेरिका में तो बहुत सम्पत्ति है, तो स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी फिर अमरीका पहुंची. और स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी ने अमेरीका में पहुँच कर 10 करोड़ रेड इंडियन्स को मौत के घाट उतार दिया.10 करोड़. और ये दस करोड़ रेड इंडियन्स मूल रूप से अमरीका के बाशिंदे थे. ये जो अमरीका का चेहरा आज आपको दिखाई देता है, ये अमरीका 10 करोड़ रेड इन्डियन की लाश पर खड़ा हुआ एक देश है. कितने हैवानियत वाले लोग होंगे, कितने नराधम किस्म के लोग होंगे, जो सबसे पहले गए अमरीका को बसाने के लिए, उसका एक अंदाजा आपको लग सकता है, आज स्थिति क्या है कि जो अमरीका की मूल प्रजा है, जिनको रेड इंडियन कहते है, उनकी संख्या मात्र 65000 रह गई है.

10 करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारने वाले लोग आज हमको सिखाते है कि हिंदुस्तान में ह्यूमन राईट की स्थिति बहुत ख़राब है. जिनका इतिहास ही ह्यूमन राईट के वोइलेसन पे टिका हुआ है, जिनकी पूरी की पूरी सभ्यता 10 करोड़ लोगों की लाश पर टिकी हुई है, जिनकी पूरी की पूरी तरक्की और विकास 10 करोड़ रेड इंडियनों लोगों के खून से लिखा गया है, ऐसे अमरीका के लोग आज हमको कहते है कि हिंदुस्तान में साहब, ह्यूमन राईट की बड़ी ख़राब स्थिति है, कश्मीर में, पंजाब में, वगेरह वगेरह. और जो काम मारने का, पीटने का, लोगों की हत्याए कर के सोना लुटने का, चांदी लुटने का काम कोलंबस और स्पेन के लोगों ने अमेरीका में किया, ठीक वही काम वास्कोडीगामा ने 1498 में हिंदुस्तान में किया.

ये वास्कोडीगामा जब कालीकट में आया, 20 मई, 1498 को, तो कालीकट का राजा था उस समय झामोरिन, तो झामोरिन के राज्य में जब ये पहुंचा वास्को डी गामा, तो उसने कहा कि मै तो आपका मेहमान हु, और हिंदुस्तान के बारे में उसको कहीं से पता चल गया था कि इस देश में अतिथि देवो भव की परंपरा. तो झामोरिन ने बेचारे ने, ये अथिति है ऐसा मान कर उसका स्वागत किया, वास्को डी गामा ने कहा कि मुझे आपके राज्य में रहने के लिए कुछ जगह चाहिए, आप मुझे रहने की इजाजत दे दो, परमीशन दे दो. झामोरिन बिचारा सीधा सदा आदमी था, उसने कालीकट में वास्को डी गामा को रहने की इजाजत दे दी. जिस वास्को डी गामा को झामोरिन के राजा ने अथिति बनाया, उसका आथित्य ग्रहण किया, उसके यहाँ रहना शुरु किया, उसी झामोरिन की वास्को डी गामा ने हत्या कराइ. और हत्या करा के खुद वास्को डी गामा कालीकट का मालिक बना. और कालीकट का मालिक बनने के बाद उसने क्या किया कि समुद्र के किनारे है कालीकट केरल में, वहां से जो जहांज आते जाते थे, जिसमे हिन्दुस्तानी व्यापारी अपना माल भर-भर के साउथ ईस्ट एशिया और अरब के देशो में व्यापार के लिए भेजते थे, उन जहांजो पर टैक्स वसूलने का काम वास्को डी गामा करता था. और अगर कोई जहांज वास्को डी गामा को टैक्स ना दे, तो उस जहांज को समुद्र में डुबोने का काम वास्कोडीगामा करता था.

और वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में आया पहली बार 1498 में, और यहाँ से जब लुट के सम्पत्ति ले गया, तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. पोर्तुगीज सरकार के जो डॉक्यूमेंट है वो बताते है कि वास्कोडीगामा पहली बार जब हिंदुस्तान से गया, लुट कर सम्पत्ति को ले कर के गया, तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया, उसके बाद दुबारा फिर आया वास्कोडीगामा । वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में 3 बार आया लगातार लुटने के बाद, चौथी बार भी आता लेकिन मर गया. दूसरी बार आया तो हिंदुस्तान से लुट कर जो ले गया वो करीब 11 से 12 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. और तीसरी बार आया और हिंदुस्तान से जो लुट कर ले गया वो 21 से 22 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. इतना सोना चांदी लुट कर जब वास्को डी गामा यहाँ से ले गया तो पुर्तगाल के लोगों को पता चला कि हिंदुस्तान में तो बहुत सम्पत्ति है. और भारतवर्ष की सम्पत्ति के बारे में उन्होंने पुर्तगालियो ने पहले भी कहीं पढ़ा था, उनको कहीं से ये टेक्स्ट मिल गया था कि भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पर महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति आया, 17 साल बराबर आता रहा, लुटता रहा इस देश को, एक ही मंदिर को, सोमनाथ का मंदिर जो वेरावल में है. उस सोमनाथ के मंदिर को महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति, एक वर्ष आया अरबों खरबों की सम्पत्ति ले कर चला गया, दुसरे साल आया, फिर अरबों खरबों की सम्पत्ति ले गया. तीसरे साल आया, फिर लुट कर ले गया. और 17 साल वो बराबर आता रहा, और लुट कर ले जाता रहा.

तो वो टेक्स्ट भी उनको मिल गए थे कि एक एक मंदिर में इतनी सम्पत्ति, इतनी पूंजी है, इतना पैसा है भारत में, तो चलो इस देश को लुटा जाए, और उस ज़माने में एक जानकारी और दे दू, ये जो यूरोप वाले अमरीका वाले जितना अपने आप को विकसित कहे, सच्चाई ये है कि 14 वी. और 15 वी. शताब्दी में दुनिया में सबसे ज्यादा गरीबी यूरोप के देशो में थी. खाने पीने को भी कुछ होता नहीं था. प्रकृति ने उनको हमारी तरह कुछ भी नहीं दिया, न उनके पास नेचुरल रिसोर्सेस है, जितने हमारे पास है. न मौसम बहूत अच्छा है, न खेती बहुत अच्छी होती थी और उद्योगों का तो प्रश्न ही नहीं उठता. 13 फी. और 14 वी. शताब्दी में तो यूरोप में कोई उद्योग नहीं होता था. तो उनलोगों का मूलतः जीविका का जो साधन था जो वो लुटेरे बन के काम से जीविका चलाते थे. चोरी करते थे, डकैती करते थे, लुट डालते थे, ये मूल काम वाले यूरोप के लोग थे, तो उनको पता लगा कि हिंदुस्तान और भारतवर्ष में इतनी सम्पत्ति है तो उस देश को लुटा जाए, और वास्को डी गामा ने आ कर हिंदुस्तान में लुट का एक नया इतिहास शुरु किया.

उससे पहले भी लुट चली हमारी, महमूद गजनवी जैसे लोग हमको लुटते रहे.
लेकिन वास्को डी गामा ने आकर लुट को जिस तरह से केन्द्रित किया और ओर्गनाइजड किया वो समझने की जरूरत है. उसके पीछे पीछे क्या हुआ, पुर्तगाली लोग आए, उन्होंने 70 –80 वर्षो तक इस देश को खूब जम कर लुटा. पुर्तगाली चले गए इस देश को लुटने के बाद, फिर उसके पीछे फ़्रांसिसी आए, उन्होंने इस देश को खूब जमकर लुटा 70 – 80 वर्ष उन्होंने भी पुरे किए. उसके बाद डच आ गये हालैंड वाले, उन्होंने इस देश को लुटा. उसके बाद फिर अंग्रेज आ गए हिंदुस्तान में लुटने के लिए ही नहीं बल्कि इस देश पर राज्य भी करने के लिए. पुर्तगाली आए लुटने के लिए, फ़्रांसिसी आए लुटने के लिए, डच आए लुटने के लिए, और फिर पीछे से अंग्रेज चले आए लुटने के लिए, अंग्रेजो ने लुट का तरीका बदल दिया. ये अंग्रेजो से पहले जो लुटने के लिए आए वो आर्मी ले कर के आए थे बंदूक ले कर के आये थे, तलवार ले के आए थे, और जबरदस्ती लुटते थे. अंग्रेजो ने क्या किया कि लुट का सिलसिला बदल दिया, और उन्होंने अपनी एक कंपनी बनाई, उसका नाम ईस्ट इंडिया रखा. ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के सबसे पहले सुरत में आए इसी गुजरात में, ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का कि जब जब इस देश की लुट हुई है इस देश की गुजरात के रास्ते हुई है.

जितने लोग इस देश को लुटने के लिए आए बाहर से वो गुजरात के रास्ते घुसे इस देश में. इसको समझिए क्यों ? क्योकि गुजरात में सम्पत्ति बहुत थी, और आज भी है. तो अंग्रेजो को लगा कि सबसे पहले लुटने के लिए चलो सूरत, पुरे हिंदुस्तान में कही नहीं गए, सबसे पहले सुरत में आए. और सुरत में आ के ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कोठी बनानी है, ऐसा वहां के नवाब के आगे उन्होंने फरमान रखा. बेचारा नवाब सीधा सदा था, उसने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को कोठी बनाने के लिए जमीन दे दी. कभी आप जाइए सूरत में, वो कोठी आज भी खड़ी हुई है, उसका नाम है, कुपर विला. एक अंग्रेज था उसका नाम था जेम्स कुपर, 6 अधिकारी आए थे सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के, उनमे से एक अधिकारी था जेम्स कुपर, तो जेम्स कुपर ने अपने नाम पर उस कोठी का नाम रख दिया कुपर विला. तो ईस्ट इंडिया कंपनी की सबसे पहली कोठी बनी सूरत में. सूरत के लोगों को मालूम नहीं था, कि जिन अंग्रेजो को कोठी बनाने के लिए हम जामीन दे रहे है, बाद में यही अंग्रेज हमारे खून के प्यासे हो जाएँगे. अगर ये पता होता तो कभी अंग्रेजो को सुरत में ठहरने की भी जमीन नहीं मिलती.

अंग्रेजो ने फिर वोही किया जो उनका असली चरित्र था. पहले कोठी बनाई, व्यापार शुरु किया, धीरे धीरे पुरे सुरत शहर में उनका व्यापार फैला, और फिर सन. 1612 में सूरत के नवाब की हत्या कराइ, जिस नवाब से जमीन लिया कोठी बनाने के लिए, उसी नवाब की हत्या कराइ अंग्रेजो ने. और 1612 में जब नवाब की हत्या करा दी उन्होंने, तो सूरत का पूरा एक पूरा बंदरगाह अंग्रेजो के कब्जे में चला गया. और अंग्रेजो ने जो काम सूरत में किया था सन. 1612 में, वही काम कलकत्ता में किया, वही काम मद्रास में किया, वही काम दिल्ली में किया, वही काम आगरा में किया, वही काम लखनऊ में किया, माने जहाँ भी अंग्रेज जाते थे अपनी कोठी बनाने के लिए अपनी ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के, उस हर शहर पर अंग्रेजो का कब्जा होता था. और ईस्ट इंडिया कंपनी का झंडा फहराया जाता था. 200 वर्षो के अंदर व्यापार के बहाने अंग्रेजो ने सारे देश को अपने कब्जे में ले लिया. 1750 तक आते आते सारा देश अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का गुलाम हो गया.
किसी को नहीं मालूम था कि जिस ईस्ट इंडिया कम्पनी को हम व्यापार के लिए छुट दे रहे है, जिन अंग्रेजो को हम व्यापार के लिए जमीन दे रहे है, जिन अंग्रेजो को व्यापार के लिए हिंदुस्तान में हम बुला के ला रहे है, वही अंग्रेज इस देश के मालिक हो जाएँगे, ऐसा किसी को अंदाजा नहीं था, अगर ये अंदाजा होता तो शायद कभी उनको छुट न मिलती.

लेकिन 1750 में ये अंदाजा हुआ, और अंदाजा हुआ 1 व्यक्ति को, उसका नाम था सिराजुद्दोला, बंगाल का नवाब था, तो बंगाल का नवाब था सिराजुद्दोला, उसको ये अंदाजा हो गया कि अंग्रेज इस देश में व्यापार करने नहीं आए है, इस देश को गुलाम बनाने आए है, इस देश को लुटने के लिए आए है. क्योकि इस देश में सम्पत्ति बहुत है, क्योकि इस देश में पैसा बहुत है. तो सिराजुद्दोला ने फैसला किया कि अंग्रेजो के खिलाफ कोई बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. और उस बड़ी को लड़ाई लड़ने के लिए सिराजुद्दोला ने युद्ध किया अंग्रेजो के खिलाफ, इतिहास की चोपड़ी में आपने पढ़ा होगा कि पलासी का युद्ध हुआ, 1757 मे . लेकिन इस युद्ध की एक ख़ास बात है जो मै आपको याद दिलाना चाहता हु, आज के समय में भी वो बहुत महत्वपूर्ण है. 1757 में जब पलासी का युद्ध हुआ. मै बचपन में जब विद्यार्थी था कक्षा 9 में पढता था मै, तो मै मेरे इतिहास के अध्यापक से ये पूछता था कि सर मुझे ये बताईए कि पलासी के युद्ध में अंग्रेजो की तरफ से कितने सिपाही थें लड़ने वाले. तो मेरे अध्यापक कहते थे कि मुझको नहीं मालूम. तो मै कहता था क्यों नहीं मालूम, तो कहते थे कि कुझे किसी ने नहीं पढाया तो मै तुमको कहाँ से पढ़ा दू.

तो मै उनको बराबर एक ही सवाल पूछता था कि सर आप जरा ये बताईये कि बिना सिपाही के कोई युद्ध हो सकता है कि नहीं तो फिर हमको ये क्यों नहीं पढाया जाता है कि युद्ध में कितने सिपाही अंग्रेजो के पास. और उसके दूसरी तरफ एक और सवाल मै पूछता था कि अच्छा ये बताईये कि अंग्रेजो के पास कितने सिपाही थे ये तो हमको नहीं मालुम सिराजुद्दोला जो लड़ रहा था हिंदुस्तान की तरफ से उनके पास कितने सिपाही थे? तो कहते थे कि वो भी नहीं मालूम. पलासी के युद्ध के बारे में इस देश में इतिहास की 150 किताबे है जो मैंने देखी है, उन 150 मै से एक भी किताब में ये जानकारी नहीं दी गई है कि अंग्रेजो की तरफ से कितने सिपाही लड़ने वाले थे और हिंदुस्तान की तरफ से कितने सिपाही लड़ने वाले थे. और मै आपको सच बताऊ मै मेरे बचपन से इस सवाल से बहुत परेसान रहा. और इस सवाल का जवाब अभी 3 साल पहले मुझे मिला. वो भी हिंदुस्तान में नहीं मिला लन्दन में मिला.

लन्दन में एक इंडिया हाउस लाइब्रेरी है बहूत बड़ी लाइब्रेरी है, उस इंडिया हाउस लाइब्रेरी में हिंदुस्तान के गुलामी के 20000 से भी ज्यादा दस्तावेज़ रखे हुआ है. जो हमारे देश में नहीं है वहां रखे हुए है. भारतवर्ष को अंग्रेजो ने कैसे तोड़ा कैसे गुलाम बनाया इसकी पूरी विस्तृत जानकारी उन 20000 दस्तावेजो में इंडिया हाउस लाइब्रेरी में मौजूद है.
मेरे एक परिचित है प्रोफेसर धर्मपाल, वो 40 वर्ष तक यूरोप में रहे है, मैंने एक बार उनको एक चिट्ठी लिखी, मैंने कहा सर, मै ये जानना चाहता हु बेसिक क्वेश्चन कि पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास कितने सिपाही थे. तो उन्होंने कहा देखो राजीव, अगर तुमको ये जानना है तो बहुत कुछ जानना पड़ेगा, और तुम तैयार हो जानने के लिए, तो मैंने कहा मै सब जानना चाहता हु. मै इतिहास का विद्यार्थी नहीं लगा लेकिन इतिहास को समझना चाहता हु कि ऐसी कौन सी ख़ास बात थी जो हम अंग्रेजो के गुलाम हो गए, ये समझ में तो आना चाहिए अपने को, कि कैसे हम अंग्रेजो के गुलाम हो गए. ये इतना बड़ा देश, 34 करोड़ की आबादी वाला देश 50 हजार अंग्रेजो का गुलाम कैसे हो गया ये समझना चाहिए. तो वो पलासी के युद्ध पर से वो समझ में आया. उन्होंने कुछ दस्तावेज़ मुझे भेजें, फोटोकॉपी करा के और मेरे पास अभी भी है. उन दस्तावेजो को जब मै पढता था तो मुझे पता चला कि पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास मात्र 300 सिपाही थे, 3 हंड्रेड. और सिराजुद्दोला के पास 18000 सिपाही थे. अब किसी भी सामने के विद्यार्थी से, बच्चे से, या सामान्य बुद्धि के आदमी से आप ये पूछो के एक बाजु में 300 सिपाही, और दुसरे बाजु में 18000 सिपाही, कौन जीतेगा? 18000 सिपाही जिनके पास है वो जीतेगा.

लेकिन जीता कौन ? जिनके पास मात्र 300 सिपाही थे वो जीत गए, और जिनके पास 18000 सिपाही थे वो हार गए. और हिंदुस्तान के, भारतवर्ष के एक एक सिपाही के बारे में अंग्रेजो के पार्लियामेंट में ये कहा जाता था कि भारतवर्ष का 1 सिपाही अंग्रेजो के 5 सिपाही को मारने के लिए काफी है, इतना ताकतवर, तो इतने ताकतवर 18000 सिपाही अंग्रेजो के कमजोर 300 सिपाहियो से कैसे हारे ये बिलकुल गम्भीरता से समझने की जरुरत है. और उन दस्तावेजो को देखने के बाद मुझे पता चला कि हम कैसे हारे. अंग्रेजो की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था. और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दोला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफ़र. तो हुआ क्या था रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियो से सामने से हम लड़ेंगे तो हम 300 लोग है मारे जाएँगे, 2 घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा. और क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिस पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था. क्लाइव की 2 चिट्ठियाँ है उन दस्तावेजो में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ 300 सिपाही है, और सिराजुद्दोला के पास 18000 सिपाही है. हम युद्ध जीत नहीं सकते है, अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेजी पार्लियामेंट ये चाहती है कि हम पलासी का युद्ध जीते, तो जरुरी है कि हमारे पास और सिपाही भेजे जाए.

उस चिट्ठी के जवाब में क्लाइव को ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक चिट्ठी मिली थी और वो बहुत मजेदार है उसको समझना चाहिए. उस चिट्ठी में ब्रिटिश पार्लियामेंट के लोगों ने ये लिखा कि हमारे पास इससे ज्यादा सिपाही है नहीं. क्यों नहीं है ? क्योकि 1757 में जब पलासी का युद्ध शुरु होने वाला था उसी समय अंग्रेजी सिपाही फ़्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. और नेपोलियन बोनापार्ट क्या था अंग्रेजो को मार मार के फ़्रांस से भगा रहा था. तो पूरी की पूरी अंग्रेजी ताकत और सेना नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ फ़्रांस में लडती थी इसी लिए वो ज्यादा सिपाही दे नहीं सकते थे, तो उन्होंने कहा अपने पार्लियामेंट में कि हम इससे ज्यादा सिपाही आपको दे नहीं सकते है. जो 300 सिपाही है उन्ही से आपको पलासी का युद्ध जीतना होगा. तो रोबर्ट क्लाइव ने अपने दो जासूस लगाए, उसने कहा देखो युद्ध लड़ेंगे तो मारे जाएँगे, अब आप एक काम करो, उसने दो अपने साथिओं को कहा कि आप जाओ और सिराजुद्दोला की आर्मी में पता लगाओ कि कोई ऐसा आदमी है क्या जिसको रिश्वत दे दें. जिसको लालच दे दें. और रिश्वत के लालच में जो अपने देश से गद्दारी करने को तैयार हो जाए, ऐसा आदमी तलाश करो.

उसके दो जासूसों ने बराबर सिराजुद्दोला की आर्मी में पता लगाया कि हां एक आदमी है, उसका नाम है मीर जाफर, अगर आप उसको रिश्वत दे दो, तो वो हिंदुस्तान को बेंच डालेगा. इतना लालची आदमी है. और अगर आप उसको कुर्सी का लालच दे दो, तब तो वो हिंदुस्तान की 7 पुश्तो को बेंच देगा. और मीर जाफर क्या था, मीर जाफर ऐसा आदमी था जो रात दिन एक ही सपना देखता था कि एक न एक दिन मुझे बंगाल का नवाब बनना है. और उस ज़माने में बंगाल का नवाब बनना ऐसा ही होता था जैसे आज के ज़माने में बहुत नेता ये सपना देखते है कि मुझे हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनना है, चाहे देश बेंचना पड़े. तो मीर जाफर के मन का ये जो लालच था कि मुझे बंगाल का नवाब बनना है. माने कुर्सी चाहिए, और मुझे पूंजी चाहिए, पैसा चाहिए, सत्ता चाहिए और पैसा चाहिए. ये दोनो लालच उस समय मीर जाफर के मन में सबसे ज्यादा प्रबल थे, तो उस लालच को रोबर्ट क्लाइव ने बराबर भांप लिया.

तो रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को चिट्ठी लिखी है. वो चिट्ठी दस्तावेजो में मौजूद है और उसकी फोटोकोपी मेरे पास है. उसने चिट्ठी में दो ही बातें लिखी है, देखो मीर जाफर अगर तुम अंग्रेजो के साथ दोस्ती करोगे, और ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करोगे, तो हम तुमको युद्ध जीतने के बाद बंगाल का नवाब बनाएँगे. और दूसरी बात कि जब आप बंगाल के नवाब हो जाओगे तो सारी की सारी सम्पत्ति आपकी हो जाएगी. इस सम्पत्ति में से 5 टका हमको दे देना, बाकि तुम जितना लूटना चाहो लुट लो. मीर जाफर चूँकि रात दिन ये ही सपना देखता था कि किसी तरह कुर्सी मिल जाए, और किसी तरह पैसा मिल जाए, तुरंत उसने वापस रोबर्ट क्लाइव को चिट्ठी लिखी और उसने कहा कि मुझे आपकी दोनों बातें मंजूर है. बताईए करना क्या है ? तो आखरी चिट्ठी लिखी है रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को कि आपको सिर्फ इतना करना है कि युद्ध जिस दिन शुरु होगा, उस दिन आप अपने 18000 सिपाहियो को कहिए की वो मेरे सामने सरेंडर कर दें बिना लड़े.

मीर जाफर ने कहा कि आप अपनी बात पे कायम रहोगे ? मुझे नवाब बनाना है आपको. तो रोबर्ट ने कहा कि बराबर हम अपनी बात पे कायम है, आपको हम बंगाल का नवाब बना देंगे. बस आप एक ही काम करो कि अपनी आर्मी से कहो, क्योकि वो सेनापति था आर्मी का, तो आप अपनी आर्मी को आदेश दो कि युद्ध के मैदान में वो मेरे सामने हथियार डाल दे, बिना लड़े, मीर जाफर ने कहा कि ऐसा ही होगा. और युद्ध शुरु हुआ 23 जून 1757 को. इतिहास की जानकारी के अनुसार २३ जून १७५७ को युद्ध शुरु होने के 40 मिनट के अंदर भारतवर्ष के 18000 सिपाहियो ने मीर जाफर के कहने पर अंग्रेजो के 300 सिपाहियो के सामने सरेंडर कर दिया.

रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया कि अपने 300 सिपाहियो की मदद से हिंदुस्तान के 18000 सिपाहियो को बंदी बनाया, और कलकत्ता में एक जगह है उसका नाम है फोर्ट विलियम, आज भी है, कभी आप जाइए, उसको देखीए. उस फोर्ट विलियम में 18000 सिपाहियो को बंदी बना कर ले गया. 10 दिन तक उसने भारतीय सिपाहियो को भूखा रखा और उसके बाद ग्यारहवे दिन सबकी हत्या कराई. और उस हत्या कराने में मीर जाफ़र रोबर्ट क्लाइव के साथ शामिल था, उसके बाद रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया, उसने बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला की हत्या कराई मुर्शिदाबाद में, क्योकि उस जमाने में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद होती थी, कलकत्ता नही. सिराजुद्दोला की हत्या कराने में रोबर्ट क्लाइव और मीर जाफ़र दोनों शामिल थे. और नतीजा क्या हुआ ? बंगाल का नवाब सिराजुद्दोला मारा गया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भागने का सपना देखता था इस देश में वो मारा गया, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करने की बात करता था वो बंगाल का नवाब हो गया, मीर जाफ़र.

इस पुरे इतिहास की दुर्घटना को मै एक विशेष नजर से देखता हु. मै कई बार ऐसा सोंचता हु कि क्या मीर जाफ़र को मालूम नहीं था कि ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करेंगे तो इस देश की गुलामी आएगी ? मिर जाफ़र जानता था इस बात को. मीर जाफ़र बराबर जानता था कि मै मेरे कुर्सी के लालच में जो खेल खेल रहा हु उस खेल में इस देश को सैंकड़ो वर्षो की गुलामी आ सकती है. ये वो जनता था. और ये भी जानता था कि अपने स्वार्थ में, अपने लालच में मै जो गद्दारी करने जा रहा हु इस देश के साथ उसके क्या दुष्परिणाम होंगे, वो भी उसको मालूम थे.

मै ऐसा सोंचता हु कि हम गुलामी से आजाद हो जाते, क्योकि 18000 सिपाही हमारे पास थे और 300 अंग्रेज सिपाहियो को मारना बिलकुल आसन काम था हमारे लिए. हम 1757 में ही अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो जाते एक बात और दूसरी बात ये जो २०० वर्षो की गुलामी हमको झेलनी पड़ी १७५७ से १९४७ तक, और उस २०० वर्ष की गुलामी को भागने के लिए ६ लाख लोगों की जो क़ुरबानीयां हमको देनी पड़ी, वो बच गया होता. भगत सिंह, चंद्रशेखर, उधम सिंह, तांत्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चन्द्र बोस, ऐसे ऐसे नौजवानों की कुर्बानिया दी है ये कोई छोटे मोटे लोग नहीं थे. सुभाष चन्द्र बोस तो आईपीएस टोपर थे, उधम सिंह चाहता तो ऐयासी कर सकता था, बड़े बाप का बेटा था. भगत सिंह और चंद्रशेखर की भी यही हैसियत थी. चाहते तो जिन्दगी की, जवानी की रंगरलियां मानते और अपनी नौजवानी को ऐसे फंदे में नहीं फ़साते. ये सारे वो नौजवान थें जिनका खून इस देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण था. ६ लाख ऐसे नौजवानों की कुर्बानियां जो हमने दी, वो नहीं देनी पड़ती. और अंग्रेजो की जो यातनाए सही, जो अपमान हमने बर्दास्त किया, वो नहीं करना पड़ता अगर एक आदमी नहीं होता, मीर जाफ़र. लेकिन चूँकि मीर जाफ़र था, मीर जाफ़र का लालच था, कुर्सी का और पैसे का, उस लालच ने इस देश को २०० वर्ष के लिए गुलाम बना दिया.!!

और मै आपसे यही कहने आया हु कि 1757 में तो एक मीर जाफ़र था आज हिंदुस्तान में हज़ारो मीर जाफ़र है. जो देश को वैसे ही गुलाम बनाने में लगे हुए है जैसे मीर जाफ़र ने बनाया था, मीर जाफ़र ने क्या किया था, विदेशो कंपनी को समझौता किया था बुला के, और विदेशो कंपनी से समझौता करने के चक्कर में उसे कुर्सी मिली थी और पैसा मिला था. आज जानते है हिंदुस्तान का जो नेता प्रधानमंत्री बनता है, हिंदुस्तान का जो नेता मुख्यमंत्री बनता है वो सबसे पहला काम जानते है क्या करता है ? प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है और कहता है विदेशो कंपनी वालो तुम्हारा स्वागत है, आओ यहाँ पर और बराबर इस बात को याद रखिए ये बात 1757 में मीर जाफ़र ने कही थी ईस्ट इंडिया कंपनी से कि अंग्रेजो तुम्हारा स्वागत है, उसके बदले में तुम इतना ही करना कि मुझे कुर्सी दे देना और पैसा दे देना. आज के नेता भी वही कह रहे है, विदेशी कंपनी वालों तुम्हारा स्वागत है.

और हमको क्या करना, हमको कुछ नहीं, मुख्यमंत्री बनवा देना, प्रधानमंत्री बनवा देना. 100 – 200 करोड़ रूपये की रिश्वत दे देना, बेफोर्स के माध्यम से हो के एनरोंन के माध्यम से हो. हम उसी में खुश हो जाएँगे, सारा देश हम आपके हवाले कर देंगे. ये इस समय चल रहा है. और इतिहास की वही दुर्घटना दोहराइ जा रही है जो 1757 में हो चुकी है. और मै आपसे मेरे दिल का दर्द रहा रहा हु कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी इस देश को २०० – २५० वर्ष इस देश को गुलाम बना सकती है, लुट सकती है तो आज तो इन मीर जफरो ने 6000 विदेशी कम्पनियो को बुलाया है. !!

Sunday, November 10, 2019

Rajiv dixit ji संबसे पहले सिक्का, बारूद, पारा, जिंक किसने बनाया ?

दोस्तों क्या आप जानते है दुनिया का सबसे पहला सिक्का (कॉइन) भारत ने बनाया और पूरी सदुनिया को सिक्का बनाना सिखाया| अगर आप सिन्धु घाटी की सभ्यता का इतिहास पढेगे जोकि आज से 3000-3500 साल पहले का इतिहास है उसमे सिक्के बनाने का बहुत ही विस्तार से वर्णन है और सिक्को की ढलाई करने वाली बहुत सी फक्टोरियों की जानकारी है. इसी तरह से जस्ता बनाना जिसको जिंक कहते है सारी दुनिया को भारत ने सिखाया, हमसे पहले कोई नहीं जानता था कि जस्ता कैसे बनता है, जिंक कैसे बनता है और 13वी शताब्दी में भारत में एक पुस्तक लिखी गई जिसका नाम था रस रत समुथ्य उस पुस्तक में जिंक बनाने का विस्तार से वर्णन है.

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इसी प्रकार पारा (mercury) बनाना पूरी दुनिया को हमने सिखाया| पारा बना बहुत जटिल कार्य है जिसका चरक सहिता में विस्तार से वर्णन है और रस रत समुथ्य   में भी विस्तार से वर्णन है

एक और रौचक जानकारी दुनिया में सबसे पहले बारूद भी भारत ने ही बनाया था लेकिन भारत ने उसका इस्तेमाल किया फुलज़डी बनाने में, हमने बारूद बनाया सबसे पहले लेकिन उसका बम्ब नहीं बनाया उसकी फुलज़डी बनाई क्योकि हमें किसी को मारना नहीं है हम तो सदा से अहिंसा वाले लोग रहे है और दुनिया ने हमसे बारूद बनाना सिख लिया और उन्होंने फुलज़डी नहीं बनाई उन्होंने बम्ब बनाया और दुर्भाग्य से उसको हमें ही मारने के काम में लाया

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Rajiv dixit ji जानिए ! किसने सिखाया दुनिया को बर्फ बनाना ?


हमारे देश में एक महान राजा हुआ उसका नाम था हर्षवर्धन| अपने इनके बारे में पढ़ा भी होगा और सुना भी होगा| उसके बारे में एक दो बाते आपको बताना चाहुगा जैसे – वो वैज्ञानिक था लेकिन राजा हुआ, सबसे बड़ी बात उनके बारे में जो दुनिया नहीं जानती वो ये कि वो खाली राजा नहीं था, वो वैज्ञानिक था जो बाद में राजा हुआ और चक्रवर्ती सम्राट हुआ,

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चक्रवर्ती सम्राट का मतलब आप समझते हो ???

– जो एक गाँव का राजा होता है उसको हमारे देश में कहा जाता है सरपंच,

– जो दस गाँव का राजा होता है उसको कहा जाता है नायक

– जो सौ गाँव का राजा होता है उसको कहते है सामंत

– जो हजार गाँव का राजा होता है उसको कहते है राजा

– जो दस हजार गाँव का राजा होता है उसको कहते है महाराजा

– जो एक लाख गाँव का राजा हो जाये वो सम्राट

– जो सात लाख गाँव का राजा हो वो चक्रवर्ती सम्राट

और भारत में लगभग 7 लाख ही गाँव रहे तो इसका मतलब ये कि हर्षवर्धन भारत का सम्राट था और वैज्ञानिक भी था और विज्ञानं में केमिस्ट्री में उनको दक्षता थी वो साइंस शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञाता थे. जब वो राजा बने तो उनकी बेटी बीमार हो गई और उसको बहुत तेज बुखार आ गया तो हर्षवर्धन ने पहली बार अपनी बेटी का बुखार उतारने के लिये बर्फ बनवाई और उसका इस्तेमाल किया, हर्ष चरित्रम करके एक पुस्तक हर्षवर्धन के बारे में लिखी गई, और इसमे इसका विस्तार से वर्णन है कि राजा हर्षवर्धन अपनी बेटी का बुखार उतारने के लिये बर्फ बना रहा है और उसमे बर्फ बनाने का विस्तार से वर्णन है हर्षवर्धन का जो समय है वो 6 वी शताब्दी का है यानी कि आज से लगभग 1500 साल पहले |

अंग्रेजो के पास बर्फ पड़ती है अमेरिका में भी बर्फ पड़ती है, फ़्रांस, जर्मनी में बर्फ पड़ती है लेकिन वो बर्फ बनाना 18 वी शताब्दी तक नहीं जानते थे, बर्फ बनाने के लिये पानी को एक विशेष तापमान पर रखना पड़ता है और एक विशेष दबाव उसको देना पड़ता है Atmospheric pressure और temperature को कण्ट्रोल करके ही बर्फ बन सकती है जोकि बहुत जटिल प्रक्रिया है कोई आसान काम नहीं है, भगवान ने हमें बर्फ बहुत कम मात्रा में दी है लेकिन बनाना हमको दुनिया में सबसे पहले आया

पूरी दुनिया को बर्फ बनाना भारत ने सिखाया | हमारा भारत देश बहुत ही अदभुत है हमारे यहा बर्फ सबसे कम होती है लेकिन पूरी दुनिया को बर्फ बनाना हमने सिखाया | भारत में बर्फ कुल मिलाकर 2-4 राज्यों में है जहा पर बर्फ गिरती है ये जो बर्फ गिरती है ये प्रकृति की बनाई हुई है लेकिन हम भारतवासी इस पर गर्व कर सकते है कि मनुष्य की बनाई हुई सबसे पहली बर्फ हमने दुनिया को दी है और उसकी तकनिकी भी हमने ही पूरी दुनियां को दी है अंग्रेज लोग बताते है कि उन्होंने 18वी सबसे पहले बर्फ बनाई लेकिन हमने तो इससे हजार साल पहले ही बर्फ बना ली थी

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सविधान के कुछ बहुत बड़े महाझुठ जो आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे


सविधान भारतीयों ने बनाया है >> जो सविंधान अंग्रेजो ने (government of Indian act 1935) हमें लूटने के लिए बनाया लिया था उसी को संविधान बनाने वालो ने इधर उधर फेरबदल करके पूरी तरह से अपना लिया. 
बनने में 2 साल 11 महीने लगे >> कहा जाता है की इसको बनाने में 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे. लेकिन हकीकत है की सभा ने सिर्फ 166 घंटे ही सविंधान बनाने के लिए काम किया था. इस हिसाब अगर 8 घंटे / दिन काम हो तो सिर्फ 20 दिन में ही सविंधान बन गया था, दुनिया का सबसे बड़ा सविंधान सिर्फ 20 दिन में बन गया है ना आश्चर्य की बात ??

भारत धर्मनिरपेक्ष  देश है >> संविधान के अनुसार भारत धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन भारत की परम्परा के अनुसार कोई भी देश धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता है बल्कि पंथ और सम्प्रदाय निरपेक्ष हो सकता है. मनु समृति में धर्म के 10 लक्षण दिए गए हैं. जो उनको अपनाये धार्मिक है भले ही वो किसी भी धर्म या जाती का हो. क्या संविधान निर्माताओ के पास इंतना भी धर्म का ज्ञान नहीं था जितना हमारे जैसे छोटे मोटे लोगों पर है ??
दूरदर्शी ओर देशभक्तों ने बनाया >> कहा जाता है की संविधान बड़े ही दूरदर्शी और देशभक्त लोगो ने बनाया था. लेकिन अगर बनाने वाले इतने ही दूरदर्शी थे क्यों इसमें महज 62 सालो में 97 संसोधन (2009 तक) करने पड़ गए हैं ??? रही बात देशभक्ति की तो हिंदी के साथ साथ सविंधान को अंग्रेजी में क्यों लिखा गया क्या भारत में क्या और कोई सम्रध भाषा नही थी जिसमें सविधान को लिखा जा सकता था ???

आदरणीय अम्बेडकर साहब ने 1953 में राज्य सभा में जमकर विरोध किया था. उन्होंने कहा था की हमारे शहीदों के आशाओं पर ये सविधान खरा नहीं उतर पाएगा इसलिए इसे दुबारा बनाना चाहिए.

हमारा महान संविधान देश के 70 % लोगो के लिए रोटी का इंतजाम नहीं कर पा रहा है बाकी की बातें तो बहुत दूर की हैं, ये देश 12 हज़ार साल तक पवित्र गीता द्वारा दिखाए मार्ग पर चला और विश्व गुरु बनने में कामयाब रहा है, देखिये तो सही 12 हज़ार साल पुराने ग्रन्थ में कही कोई ऐसी बात नहीं जिसका संशोधन किया जा सके, ये है भारत की महान परम्परा जिसको हम भूल गए हैं धयान रखिये जो दुःख व्यवस्था जनित हो उसको किसी भी प्रकार से दूर नहीं किया जा सकता है !!

जय भारत, वन्देमातरम, भारत माता की जय, जय हिन्द.. !

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Saturday, November 9, 2019

देखिए कैसे अंग्रेजो ने एक औरत का इस्तेमाल करके हमारे देश के 2 टुकड़े किए

Rajiv dixit ji

देखिए कैसे अंग्रेजो ने एक औरत का इस्तेमाल करके हमारे देश के 2 टुकड़े किए


जब लॉर्ड माउंटबेटन भारत आये तो उनके साथ-साथ एडविना माउंटबेटन को भी इनकी पत्नी बनाकर भारत भेज दिया था. लॉर्ड माउंटबेटन  ने अपनी डायरी में खुलासा किया था कि वह कभी भी पत्नी एडविना के साथ बिस्तर पर नहीं गये थे. असल में यह स्त्री सिर्फ और सिर्फ नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के लिए भेजी गयी थी. अंग्रेज नेहरु और जिन्ना की कमजोरी जानते थे. वह जानते थे कि दोनों एक ही औरत से प्यार करते हैं. मोहम्मद अली जिन्ना तो खुलेआम कई चीजों के लिए बदनाम था और उस समय में मुसलमान भाई, इसको अपना नेता नहीं मानते थे. भला एक सच्चा मुसलमान शराब कैसे पी सकता था?
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पंडित नेहरु के बारे में ब्रिटिश पार्लियामेंट में जब डिबेट चलता था तो वो डिबेट क्या होता था उसको समझिये, एक बार एक विलियम बिल्बर्ड फोर्ट नाम का एक ऍम. पी. था उसने पंडित नेहरु के बारे में एक स्टेटमेंट किया अपने पार्लियामेंट में, इंग्लैंड पार्लियामेंट में, उसने कहा कि पंडित नेहरु शरीर से देखने में हिन्दुस्तानी है, लेकिन दिमाग से १०० प्रतिशत खरा अंग्रेज है इसलिए इसके हाँथ में सत्ता दो, बिलकुल सुरक्षित है. और उसने वो भी माना. ऐसे आदमी के हाँथ में सत्ता दी गई और वो सत्ता देने का नाटक चला, और उस आदमी के हाँथ में सत्ता देने के लिए ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर के बहुत सारे अग्रीमेंट हुए, उनमे से दो – तीन अग्रीमेंट महत्वपूर्ण है जो समझने चाहिए, हिंदुस्तान में १९४७ तक अंग्रेजो की १२७ कम्पनिया काम कर रही थी. लार्ड माउन्ट बैटन को चिंता ये थी कि अगर हिन्दुस्तानी आजाद होने के बाद सारी अंग्रेजी कम्पनियों को हिंदुस्तान से भगा देंगे तो ये जो लूट हो रही है, ये जो सम्पत्ति मिल रही है, ये जो पैसा आ रहा है ये बंद हो जाएगा.
तो पंडित नेहरु के साथ लार्ड माउन्ट बैटन की चर्चा हुई, और पंडित नेहरु ने कहा कि आप चिंता मत करिए, हम अंग्रेजो की एक कंपनी को भगाएँगे, ईस्ट इंडिया कंपनी को बाकि १२६ कम्पनियों को हिंदुस्तान में रख लेंगे. ईस्ट इंडिया कंपनी को भागना इसलिए जरूरी है क्योकि सारे देश में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ माहौल बना हुआ है. इसलिए सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी को विदा कर दो, बाकि जो अंग्रेजी कम्पनिया है उनको हम रख लेंगे, और उनमे से एक दो नाम मै आपको बता दू जिनको पंडित नेहरु ने जाने नहीं दिया, ब्रूक बांड इंडिया लिमिटेड, ये अंग्रेजो की कंपनी है, आज की नहीं है. सन १८९० की है. लिप्टन इंडिया लिमिटेड, ये अंग्रेजो की कंपनी है, आज की नहीं है. सन १८९२ की है. आज से १०० साल १५० साल पहले की कंपनी है. और ऐसी १२६ कम्पनियों को पंडित नेहरु ने बाकायदा ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की अग्रीमेंट कर के अंग्रेजो की कम्पनियों को रखा. तो आज़ादी का मतलब क्या था? ईस्ट इंडिया कंपनी भगा देंगे, और बाकि अंग्रेजी कम्पनिया जो इस देश को लुट रही है उसको नही भगाएँगे ?
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भारत की आजादी से जुड़ी 7 अनकही रोचक बातें ! जो ना कभी पढ़ी होगी ना सुनी होगी

Rajiv dixit ji

भारत की आजादी से जुड़ी 7 अनकही रोचक बातें ! जो ना कभी पढ़ी होगी ना सुनी होगी



15 अगस्त का दिन भारत के लिए अविस्मरणीय है। इसी दिन भारत ने मध्यकालीन और ब्रिटिश गुलामी की जंजीरें तोड़ एक नए युग में कदम रखा था। लेकिन आप में से बहुत कम लोग होंगे जो इस दिन से जुड़ी भारत की कई यादों के बारे में जानते होंगे। आइए देखें कि भारत की आजादी से जुड़े वो रोचक तथ्य जिसके बारे में अब तक आप अनजान थे…
भारत से पहले पाकिस्तान का जन्म
भारत के अंतिम वायसराय लाउड माउंडवेंटन ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने भारत और पाकिस्तान की आजादी  का दिन चुना। माउंडवेंटन भारत आए थे तो उन्हें भारत और पाकिस्तान अविभाजित मिला था। ऐसे में किसी भी विवाद को जन्म देने से बचने के लिए वायसराय ने 14 अगस्त को पाक को आजादी दी और लाहौर को उसकी राजधानी घोषित कर दी।
भारत की आज़ादी के लिए 15 अगस्‍त का ही दिन क्‍यों?
यह लार्ड माउंटबेटन ही थे जिन्‍होंने निजी तौर पर भारत की स्‍वतंत्रता के लिए 15 अगस्‍त का दिन तय किया क्‍योंकि इस दिन को वे अपने कार्यकाल के लिए बेहद सौभाग्‍यशाली मानते थे। इसके पीछे खास वजह थी। असल में दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान 1945 में 15 अगस्‍त के ही दिन जापान की सेना ने उनकी अगुवाई में ब्रिटेन के सामने आत्‍मसमर्पण कर दिया था। माउंटबेटन उस समय संबद्ध सेनाओं के कमांडर थे। इसके आलावा जब लार्ड माउन्ट बैटन इस देश को आज़ाद करने की बात कर रहा था, तो इस देश के बहुत सारे ज्योतिषी थे, पुराने दस्तावेज़ राजीव भाई ने बहुत इकट्ठे किये है और उनको जब राजीव भाई देख रहे थे तो १९४५ से इस देश में बहुत सारे ज्योतिषियो ने भविष्यवाणी करना शुरु किया, और सारे ज्योतिषी इस बात से सहमत थे कि १५ अगस्त १९४७ की रात को आज़ादी न ली जाये, वो दिन अच्छा नहीं है, अगर इस दिन आजादी ली तो ये देश नहीं बचेगा टुकडो में टूटेगा ओर वही हुआ पहले पाकिस्तान ओर फिर बांग्लादेश ओर अब भी बहुत से राज्य में अलग होने के आन्दोलन चल रहे है जैसे पंजाब, नागालैंड, जम्मू ओर कश्मीर आदि| ज्योतिष के  अपने कुछ कैलकुलेशन्स होंगे, इस देश में ज्योतिष का शास्त्र है, ज्योतिष का विज्ञान है और बहुत विकसित विज्ञान है, और इस देश के उस ज़माने के सारे बड़े ज्योतिष शास्त्री कह रहे थे कि १५ अगस्त १९४७ की रात को आज़ादी मत लीजिए, पंडित नेहरु से मना किया था, सरदार पटेल से मना किया था. लेकिन ये सत्ता के मोह में इतने अंधे थे कि जो कुछ अंग्रेज कह रहे है वो ही माना |
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ट्रिस्ट विद डेस्टनी’
जवाहर लाल नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लॉज से दिया था। तब नेहरू प्रधानमंत्री नहीं बने थे। इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे।
बिना राष्ट्रगान के जश्न
भारत 15 अगस्त को आज़ाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्र गान नहीं था। रवींद्रनाथ टैगोर जन-गण-मन 1911 में ही लिख चुके थे, लेकिन यह राष्ट्रगान 1950 में ही बन पाया। ये राष्ट्र गान भी भारत की गुलामी का प्रतिक है जो आप निचे विडियो में देख सकते है … भारत का गीत तो वन्दे मातरम है..
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गांधी जी नहीं हुए शामिल
महात्मा गांधी आज़ादी के दिन दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर बंगाल नोआखली में थे, जहां वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन पर थे।
लाल किले पर नहीं पहराया गया था झंडा
हर स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री लालकिले से झंडा फहराते हैं। लेकिन 15 अगस्त, 1947 को ऐसा नहीं हुआ था। नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लालकिले से झंडा फहराया था।
तीन देशों की आजादी
15 अगस्त भारत के अलावा तीन अन्य देशों का भी स्वतंत्रता दिवस है। दक्षिण कोरिया जापान से 15 अगस्त, 1945 को आज़ाद हुआ। ब्रिटेन से बहरीन 15 अगस्त, 1971 को और फ्रांस से कांगो 15 अगस्त, 1960 को आज़ाद हुआ।
इस विडियो में देखिए भारत की आजादी का असली इतिहास >>
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नेहरू और जिन्ना थे एडविना के 2 प्रेमी ! भारत विभाजन का मुख्य कारण थी ये लव स्टोरी !

Rajiv dixit ji
नेहरू और जिन्ना थे एडविना के 2 प्रेमी ! भारत विभाजन का मुख्य कारण थी ये लव स्टोरी !


लन्दन हेरिस कालेज में तीन लोग साथ पढ़ते थे. जवाहरलाल नेहरू – मोहम्मद जिन्ना और एडविना माउंटबेटन. तीनों इंग्लैंड के एक ही कालेज में थे. कालेज के कुछ ऐसे दस्तावेज राजीव दीक्षित जी के  पास  थे. जो यह साबित करते हैं कि एडविना माउंटबेटन सुबह नेहरू से मिलती थीं और शाम को मोहम्मद अली जिन्ना से वह डेट करती थीं. यह खुलासा स्वर्गीय राजीव दीक्षित करते थे. आप यह सब विडियो में देख सकते है. अब जब लॉर्ड माउंटबेटन भारत आये तो उनके साथ-साथ एडविना माउंटबेटन को भी इनकी पत्नी बनाकर भारत भेज दिया था. लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी डायरी में खुलासा किया था कि वह कभी भी पत्नी एडविना के साथ बिस्तर पर नहीं गये थे.
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असल में यह स्त्री सिर्फ और सिर्फ नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के लिए भेजी गयी थी. अंग्रेज नेहरु और जिन्ना की कमजोरी जानते थे. वह जानते थे कि दोनों एक ही औरत से प्यार करते हैं. मोहम्मद अली जिन्ना तो खुलेआम कई चीजों के लिए बदनाम था. बड़ी चालाकी से यह स्त्री नेहरू के करीब रहती थी ताकि नेहरू से वह अपनी बातें मनवा सके. अब जब खुद एडविना माउंटबेटन की बेटी ने इस लव स्टोरी का खुलासा किया है.
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Rajiv dixit ji ,swadeshi bharat

इतिहास का सबसे बड़ा झूठ जो हम सबको स्कूल में पढ़ाया गया


आज से लगभग 500 साल पहले, वास्को डी गामा हिंदुस्तान आया था . इतिहास की चोपड़ी में, इतिहास की किताब में हमसब ने पढ़ा होगा कि सन. 1498 में मई की 20 तारीख को वास्को डी गामा हिंदुस्तान आया था. इतिहास की चोपड़ी में हमको ये बताया गया कि वास्को डी गामा ने हिंदुस्तान की खोज की, पर ऐसा लगता है कि जैसे वास्को डी गामा ने जब हिंदुस्तान की खोज की, तो शायद उसके पहले हिंदुस्तान था ही नहीं. हज़ारो साल का ये देश है, जो वास्को डी गामा के बाप दादाओं के पहले से मौजूद है इस दुनिया में. तो इतिहास कि चोपड़ी में ऐसा क्यों कहा जाता है कि वास्को डी गामा ने हिंदुस्तान की खोज की, भारत की खोज की. और मै मानता हु कि वो एकदम गलत है.
इस विडियो में देखिए पूरी सच्चाई >>
वास्को डी गामा ने भारत की कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान की भी कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान पहले से था, भारत पहले से था, वास्को डी गामा यहाँ आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए, एक बात और जो इतिहास में, मेरे अनुसार बहुत गलत बताई जाती है कि वास्को डी गामा एक बहूत बहादुर नाविक था, बहादुर सेनापति था, बहादुर सैनिक था, और हिंदुस्तान की खोज के अभियान पर निकला था, ऐसा कुछ नहीं था, सच्चाई ये है कि पुर्तगाल का वो उस ज़माने का डॉन था, माफ़िया था. जैसे आज के ज़माने में हिंदुस्तान में बहूत सारे माफ़िया किंग रहे है, उनका नाम लेने की जरुरत नहीं है, क्योकि मंदिर की पवित्रता ख़तम हो जाएगी, ऐसे ही बहूत सारे डॉन और माफ़िया किंग १५ वी सताब्दी में होते थे यूरोप में. और 15 वी. सताब्दी का जो यूरोप था.
वहां दो देश बहूत ताकतवर थें उस ज़माने में, एक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल. तो वास्को डी गामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था. 1490 के आस पास से वास्को डी गामा पुर्तगाल में चोरी का काम, लुटेरे का काम, डकैती डालने का काम ये सब किया करता था. और अगर सच्चा इतिहास उसका आप खोजिए तो एक चोर और लुटेरे को हमारे इतिहास में गलत तरीके से हीरो बना कर पेश किया गया. और ऐसा जो डॉन और माफ़िया था उस ज़माने का पुर्तगाल का ऐसा ही एक दुसरा लुटेरा और डॉन था, माफ़िया था उसका नाम था कोलंबस, वो स्पेन का था. तो हुआ क्या था, कोलंबस गया था अमेरिका को लुटने के लिए और वास्को डी गामा आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए. लेकिन इन दोनों के दिमाग में ऐसी बात आई कहाँ से, कोलंबस के दिमाग में ये किसने डाला की चलो अमेरिका को लुटा जाए, और वास्को डी गामा के दिमाग में किसने डाला कि चलो भारतवर्ष को लुटा जाए. तो इन दोनों को ये कहने वाले लोग कौन थे? अतुल भाई जो बता रहे थे, वही बात मै आपसे दोहरा रहा हु.
हुआ क्या था कि 14 वी. और 15 वी. सताब्दी के बीच का जो समय था, यूरोप में दो ही देश थें जो ताकतवर माने जाते थे, एक देश था स्पेन, दूसरा था पुर्तगाल, तो इन दोनों देशो के बीच में अक्सर लड़ाई झगडे होते थे, लड़ाई झगड़े किस बात के होते थे कि स्पेन के जो लुटेरे थे, वो कुछ जहांजो को लुटते थें तो उसकी संपत्ति उनके पास आती थी, ऐसे ही पुर्तगाल के कुछ लुटेरे हुआ करते थे वो जहांज को लुटते थें तो उनके पास संपत्ति आती थी, तो संपत्ति का झगड़ा होता था कि कौन-कौन संपत्ति ज्यादा रखेगा. स्पेन के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी या पुर्तगाल के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी. तो उस संपत्ति का बटवारा करने के लिए कई बार जो झगड़े होते थे वो वहां की धर्मसत्ता के पास ले जाए जाते थे. और उस ज़माने की वहां की जो धर्मसत्ता थी, वो क्रिस्चियनिटी की सत्ता थी, और क्रिस्चियनिटी की सत्ता में 1492 के आसपास पोप होता था जो सिक्स्थ कहलाता था, छठवा पोप. तो एक बार ऐसे ही झगड़ा हुआ, पुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओ के बीच में, और झगड़ा किस बात को ले कर था?
झगड़ा इस बात को ले कर था कि लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए. तो उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया. आदेश जारी किया, एक नोटिफिकेशन जारी किया. सन 1492 में, और वो नोटिफिकेशन क्या था? वो नोटिफिकेशन ये था कि १४९२ के बाद, सारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटा, और दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा. तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम स्पेन करेगा. ये आदेश 1492 में पोप ने जारी किया. ये आदेश जारी करते समय, जो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बांटे, और उन दोनों हिस्सों को लुटने के लिए दो अलग अलग देशो की नियुक्ति कर दे? स्पैन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटो, पुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो और 1492 में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एग्जिस्ट करता है.
ये क्रिस्चियनिटी की धर्मसत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है उसका एक अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने मान लिया कि सारी दुनिया तो हमारी है और इस दुनिया को दो हिस्सों में बांट दो पुर्तगाली पूर्वी हिस्से को लूटेंगे, स्पेनीश लोग पश्चिमी हिस्से को लूटेंगे. पुर्तगालियो को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लुटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लुट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया था. क्योकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है. और उसी लुट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया. इतिहास बताता है कि 1492 में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और 1498 में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचा

Rajiv Dixit ji on nehru reality exposed.

पंडित नेहरु की सिगरेट लाने के लिए भेजा जाता था विशेष विमान, कपडे भी लंदन से धुलकर आते थे


भोपाल। जवाहरलाल नेहरू ने मप्र को कई सौगातें दी हैं। मप्र के राजनेता शंकरदयाल शर्मा और उनके बीच खासी नजदीकी थी। इस वजह से अकसर नेहरू मप्र आया करते थे। जवाहरलाल नेहरू अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान भोपाल शहर मे 18 बार आए।
सिगरेट के लिए राज्यपाल ने इंदौर भेजा विशेष विमान… 
एक बार जवाहरलाल नेहरू भोपाल के दौरे पर थे। राजभवन में यह पता चला कि नेहरू की फेवरेट ब्रांड 555 सिगरेट भोपाल में नहीं मिल रही है। नेहरू खाने के बाद सिगरेट पीते थे। यह पता चलते ही भोपाल से इंदौर एक विशेष विमान भेजा गया। इंदौर एयरपोर्ट पर सिगरेट के कुछ पैकेट पहुंचाए गए और विमान सिगरेट के पैकेट लेकर वापस भोपाल लौट आया। इस घटना का जिक्र मप्र राजभवन की वेबसाइट पर है।
भोपाल नवाब के महल में रुकने पर राज्यपाल ने जताई नाराजगी
जवाहरलाल नेहरू जब भी भोपाल आते थे तो भोपाल नवाब के महल या उनकी चिकलोद स्थित कोठी पर रुकते थे। यह देखकर मप्र के दूसरे राज्यपाल हरि विनायक पाटस्कर काफी नाराज हुए। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से साफ कह दिया कि आप अधिकारिक यात्रा पर भोपाल आ रहे हैं, इसलिए आपके ठहरने के लिए राजभवन से उपयुक्त कोई और जगह नहीं है।भोपाल के करीब यिकलोद कोठी नवाबी दौर क्री शान मानी जाती थी । यह कोठी तीन तरफ से पहाडों से घिरी होने ओंर तालाब के किनारे होने के कारण खासी आकर्षण का केंद्र थीं। भोपाल से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित १चेयप्रनोद कोठी देश के प्रधानमंत्री को भी पसंद थी । वे यहीं रुकना पसंद करते थे। यहीं चारों ताप हरियाली और पहाड़ थे । खूबसूरती के साथ ही यह जाए सर्वसुविधायुक्त थी
नेहरू के कपडे लंदन से धुलका आते थे
नेहरू से जुही यह बात भी काफी प्रचलित है वि’ उनके कपडे धुलने के लिए लन्दन भेजे जाते थे। खानदान की जन्मभ्रूमि कश्मीर थी और नेहरू के दादा पंडित गंगाधर नेहरू दिली के कोतवाल हुआ करते थे। इसलिए उनका रौब भी उनकी जिदगी पर पडा। पिता पंडित मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद उब न्यायलय के सबसे प्रसिद्ध और सबसे रईस वकील थे। जो बेहद अनुशासनप्रिय, शानो-शोक और अंग्रेजी चाल-दाल और अपने पहनावे के लिए जाने जाते थे।
Source-dainik Bhaskar

Monday, October 28, 2019

Rajiv Dixit ji_अगर ये राजा ना होते तो 100 साल पहले ही आजाद हो जाता भारत ! एक मुख्यमंत्री भी इन्ही में से एक है


दोस्तों आपको तो पता ही होगा कि सन 1857 में अंग्रेजो के खिलाफ देश में बहुत बड़ी क्रांति हुई थी। उस क्रांति में पुरे भारत में 3 लाख 65 हजार अंग्रेज मारे गए थे। कुछ 2-4 अंग्रेज जिन्दा बच गए फिर वो भागकर किसी तरह London पहुच गए। और उन्होंने भागने के लिये पहले अपने पुरे शरीर को काला किया ताकि वो भारतवासी लगे। उन्होंने अंग्रेजो की संसद में सारी कहानी सुनाई कि भारत में तो विद्रोह हो गया है बगावत हो गयी है। इसके बाद अंग्रेजो की संसद में एक प्रशन आया कि आगे कभी की ऐसा कोई विद्रोह ना हो, इसके लिये क्या क्या करना चाहिए। तो कई लोगो ने अपने प्रेसिडेंट से कहा कि दुबारा से ऐसा ना हो इसके लिये क्या करना चाहिए। तो वहा के प्रेसिडेंट ने कहा कि तुम चिंता ना करो हमारे भारत के कई मित्र है उनकी मदद से हम फिर भारत में जायेंगे। अब आप ये सोच रहे होंगे कि उनके मित्र और दोस्त कौन??? हमारे लिये जो गद्दार वो अंग्रेजो के लिये मित्र और दोस्त। क्या आपको पता है इस देश में कई परिवारों को अंग्रेजो ने रायबहादुर, सर, नाईट हुड की पदवी दे रखी थी। और ये पदवी लेने वाले सब परिवार गद्दार निकले और इन्होने अंग्रेजो की खूब मदद की।

सारी जानकारी लिख पाना असंभव है ये विडियो देखिए >>

सबसे बड़ा परिवार जिसने 1857 के विद्रोह के बाद जिसने अंग्रेजो की मदद की वो है पटियाला का परिवार जो आज भी जिन्दा है और उसी परिवार का एक व्यक्ति मुख्यमंत्री बनता रहता है पंजाब में। पटियाला के नवाब खानदान ने 1857 की क्रांति के बाद क्रांतिकारियों की मदद नहीं की बल्कि अंग्रजो की मदद की। और उन्होंने अंग्रेजो को एक पत्र लिखा जिसकी कॉपी राजीव दीक्षित जी के पास थी, जो समय आने पर वो पुरे देश को दिखाने वाले थे। उस पत्र में वो नवाब लिखता है कि “आप आईये और भारत को दुबारा गुलाम बनाइये मै आपको 20 हजार सैनिक दूंगा और 20 करोड़ स्वर्ण मुद्राए दूंगा, आप फिर भारत में आकर अपना राज्य स्थापित करिए”। तो पटियाला के नवाब के कहने पर अंग्रेज आ गए।

इसी तरह हरियाणा के जींद का एक नवाब था इसने अंग्रेजो की मदद की। फिर ग्वालियर का ये जो सिंधिया खानदान है इसने अंग्रेजो की बहुत मदद की। ऐसे ही हैदराबाद का एक सलारजन खानदान है जिसको हैदराबाद का निजाम भी कहते थे। ऐसे कुल मिलकर 10-12 परिवार थे जिन्होंने अंग्रेजो को स्वर्ण मुद्राए दी और भारत के क्रांतिकारियों से लड़ने के लिये सैनिक भी दिए। तो इन सब राजाओ की मदद से अंग्रेजो ने फिर से इस देश में परिवेश किया और क्रांतिकारियों की कत्लेआम शुरू कर दिया पुरे देश में।

1 सितम्बर 1857 से लेकर 1 नवम्बर 1858 तक हिन्दुतान से करीब 7 लाख क्रांतिकारियों का अंग्रेजो ने कतल करवा दिया। और कतल भी कैसे किया अगर आप सुनेगे तो हैरान हो जायेंगे। एक बिठुर नाम का छोटा सा शहर है कानपूर के नजदीक वहा के 2 बड़े क्रन्तिकारी थे नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे। ये दोनों क्रांतिकारियों के शहर के 24 हजार लोगो को गोलियों और तलवार से काटकर मार दिया। तीन महीने के छोटे -2 बच्चे से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक किसी को नहीं बक्सा। उन सबका अपराध कोई भी नहीं था बस यही अपराध था कि वो लोग नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे के शहर में रहते थे। तो अंग्रेज कहते थे ये सब हमारे खिलाफ भगावत करेंगे और सब क्रन्तिकारी बनगे इसलिये सबको कतल करो और ये कत्लेआम अंग्रेजो ने भारत के पटियाला नवाब (राजा), जींद का राजा, गवालियर का सिंधिया खानदान, इन सबके सैनिको की मदद से किया। और ये सारे कत्लेआम पुरे देश में हुए जिसके कारण अंग्रेजो की सरकार फिर से स्थापित हो गई। अंग्रेजो की सरकार स्थापित होने के पश्चात् 1 नवम्बर 1858 को क्वीन विक्टोरिया ने एक ऐलान किया जो भारत के बड़े बड़े अखबारों में छपा। उस ऐलान के कहा गया कि आज के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार नहीं चलेगी कानून की सरकार चलेगी और वो सब कानून अंग्रेजो की संसद बनाएगी और उसी के आधार पर ये देश चलाया जायेगा। अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में कानून बनाने के लिये बहस ये हुई कि कानून ऐसे बनाए जाये कि सभी भारतवासी कभी भी दुबारा से खड़ा ना हो सके और अंग्रेजो के खिलाफ बगावत ना कर सके।

अंग्रेजो के खिलाफ जो पहली बगावत थी वो शास्त्र बगावत थी उसमे हतियारो का इस्तेमाल हुआ था। इसके बाद अंग्रेजो ने सबसे पहला कानून ये बनाया कि घर में हथियार वही रख सकेगा, जिसके पास लाइसेंस होगा। जिसके पास नहीं होगा वो हथियार नहीं रख सकता। तो अंग्रेजो ने “Licencing of Arms Act” पहला कानून बनाया और इस कानून के आधार पर ये किया गया कि घर घर की तलासियाँ ली गई कि किसके घर में बन्दुक है किसके घर में हसिया है, छुरा है, चाकू है सब अंग्रेजो ने छीन लिए क्योकि अंग्रेजो को इन्ही हतियारो से डर था कि कही ये लोग फिर से बगावत ना कर दे। और एक बार अगर भारतवासियों का हथियार छीन गए तो भारतवासी बहुत कमजोर हो गए और वो कमजोरी इतनी भारी पड़ी कि अगले 90 साल तक फिर हमें अंग्रेजो की गुलामी सहनी पड़ी। और ये कानून आजादी के करीब 70 साल बाद आज भी चल रहा है। आपको तो पता ही होगा हथियार वही रख सकता है जिसके पास लाइसेंस होगा और लाइसेंस देने का कम सरकार करती है पहले गोरे अंग्रेजो की सरकार यव काम करती थी अब काले अंग्रेजो की सरकार ये काम कर रही है।

दूसरा एक कानून अंग्रेजो ने बनाया इंडियन पुलिस एक्ट। कभी भी भारतवासी अंग्रेजो के खिलाफ कुछ ना करे उसके लिये उनको मारकर, पीटकर, दबाकर, कुचलकर सबकी कण्ट्रोल में रखने के लिये एक एजेंसी बनाई जिसको पुलिस कहा जाता है। क्या आपको पता है 1858 से पहले इस देश में कोई पुलिस नहीं थी। किसी भी राजा ने पुलिस नहीं रखी हा आर्मी रखी थी लेकिन पुलिस नहीं रखी। क्योकि पुलिस की जरुरत नहीं थी अपने ही लोगो को मारना पीटना, दबाना, धमकाना ये काम कोई नहीं करता है। कोई भी राजा अपनी प्रजा पर ये अत्याचार नहीं करेगा। लेकिन अंग्रेजो ने पुलिस बनाई जिसका नाम रखा “इंडियन पुलिस एक्ट” और उसमे जो आधार दिया गया वो ये कि हर पुलिस वाले को Right to offence होगा लेकिन किसी भी भारत के नागरिक को Right to Defence नहीं होगा। मतलब ये कि कोई भी पुलिस अधिकारी आपको पकड़कर लाठी से मारने लगे तो आपको लाठी पकड़ने का भी अधिकार नहीं होगा, आप सिर्फ पिटते रहिये। और अगर अपने उसकी लाठी पकड़ ली तो केस आपके खिलाफ बनेगा कि अंग्रेज अधिकारी को ड्यूटी करने से आपने रोका। और यही कानून आजादी के करीब 70 साल बाद भी चल रहा है

अंग्रेजो ने ऐसा ही एक कानून बनाया इंडियन सिविल सर्विसेज एक्ट। हमारे यहा ग्राम पंचायत होती थी जो गाँव में हर करी करती थी जैसे टैक्स लगाना या उसको गाँव के विकास के लिये खर्च करना। ये सब अधिकार छिनकर कलेक्टर को दे दिए। और उस पोस्ट को DM यानी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या कलेक्टर कहते है और ये हिज कानून के तहत हुआ उसको इंडियन सिविल सर्विसेज एक्ट कहते है। ये कानून भी अभी तक वैसे का वैसा ही चल रहा है।

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