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Saturday, November 9, 2019

भारत की आजादी से जुड़ी 7 अनकही रोचक बातें ! जो ना कभी पढ़ी होगी ना सुनी होगी

Rajiv dixit ji

भारत की आजादी से जुड़ी 7 अनकही रोचक बातें ! जो ना कभी पढ़ी होगी ना सुनी होगी



15 अगस्त का दिन भारत के लिए अविस्मरणीय है। इसी दिन भारत ने मध्यकालीन और ब्रिटिश गुलामी की जंजीरें तोड़ एक नए युग में कदम रखा था। लेकिन आप में से बहुत कम लोग होंगे जो इस दिन से जुड़ी भारत की कई यादों के बारे में जानते होंगे। आइए देखें कि भारत की आजादी से जुड़े वो रोचक तथ्य जिसके बारे में अब तक आप अनजान थे…
भारत से पहले पाकिस्तान का जन्म
भारत के अंतिम वायसराय लाउड माउंडवेंटन ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने भारत और पाकिस्तान की आजादी  का दिन चुना। माउंडवेंटन भारत आए थे तो उन्हें भारत और पाकिस्तान अविभाजित मिला था। ऐसे में किसी भी विवाद को जन्म देने से बचने के लिए वायसराय ने 14 अगस्त को पाक को आजादी दी और लाहौर को उसकी राजधानी घोषित कर दी।
भारत की आज़ादी के लिए 15 अगस्‍त का ही दिन क्‍यों?
यह लार्ड माउंटबेटन ही थे जिन्‍होंने निजी तौर पर भारत की स्‍वतंत्रता के लिए 15 अगस्‍त का दिन तय किया क्‍योंकि इस दिन को वे अपने कार्यकाल के लिए बेहद सौभाग्‍यशाली मानते थे। इसके पीछे खास वजह थी। असल में दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान 1945 में 15 अगस्‍त के ही दिन जापान की सेना ने उनकी अगुवाई में ब्रिटेन के सामने आत्‍मसमर्पण कर दिया था। माउंटबेटन उस समय संबद्ध सेनाओं के कमांडर थे। इसके आलावा जब लार्ड माउन्ट बैटन इस देश को आज़ाद करने की बात कर रहा था, तो इस देश के बहुत सारे ज्योतिषी थे, पुराने दस्तावेज़ राजीव भाई ने बहुत इकट्ठे किये है और उनको जब राजीव भाई देख रहे थे तो १९४५ से इस देश में बहुत सारे ज्योतिषियो ने भविष्यवाणी करना शुरु किया, और सारे ज्योतिषी इस बात से सहमत थे कि १५ अगस्त १९४७ की रात को आज़ादी न ली जाये, वो दिन अच्छा नहीं है, अगर इस दिन आजादी ली तो ये देश नहीं बचेगा टुकडो में टूटेगा ओर वही हुआ पहले पाकिस्तान ओर फिर बांग्लादेश ओर अब भी बहुत से राज्य में अलग होने के आन्दोलन चल रहे है जैसे पंजाब, नागालैंड, जम्मू ओर कश्मीर आदि| ज्योतिष के  अपने कुछ कैलकुलेशन्स होंगे, इस देश में ज्योतिष का शास्त्र है, ज्योतिष का विज्ञान है और बहुत विकसित विज्ञान है, और इस देश के उस ज़माने के सारे बड़े ज्योतिष शास्त्री कह रहे थे कि १५ अगस्त १९४७ की रात को आज़ादी मत लीजिए, पंडित नेहरु से मना किया था, सरदार पटेल से मना किया था. लेकिन ये सत्ता के मोह में इतने अंधे थे कि जो कुछ अंग्रेज कह रहे है वो ही माना |
सारी जानकारी लिख पाना असंभव है ये विडियो देखिए >>
ट्रिस्ट विद डेस्टनी’
जवाहर लाल नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लॉज से दिया था। तब नेहरू प्रधानमंत्री नहीं बने थे। इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे।
बिना राष्ट्रगान के जश्न
भारत 15 अगस्त को आज़ाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्र गान नहीं था। रवींद्रनाथ टैगोर जन-गण-मन 1911 में ही लिख चुके थे, लेकिन यह राष्ट्रगान 1950 में ही बन पाया। ये राष्ट्र गान भी भारत की गुलामी का प्रतिक है जो आप निचे विडियो में देख सकते है … भारत का गीत तो वन्दे मातरम है..
सारी जानकारी लिख पाना असंभव है ये विडियो देखिए >>
गांधी जी नहीं हुए शामिल
महात्मा गांधी आज़ादी के दिन दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर बंगाल नोआखली में थे, जहां वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन पर थे।
लाल किले पर नहीं पहराया गया था झंडा
हर स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री लालकिले से झंडा फहराते हैं। लेकिन 15 अगस्त, 1947 को ऐसा नहीं हुआ था। नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लालकिले से झंडा फहराया था।
तीन देशों की आजादी
15 अगस्त भारत के अलावा तीन अन्य देशों का भी स्वतंत्रता दिवस है। दक्षिण कोरिया जापान से 15 अगस्त, 1945 को आज़ाद हुआ। ब्रिटेन से बहरीन 15 अगस्त, 1971 को और फ्रांस से कांगो 15 अगस्त, 1960 को आज़ाद हुआ।
इस विडियो में देखिए भारत की आजादी का असली इतिहास >>
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Rajiv dixit ji ,swadeshi bharat

इतिहास का सबसे बड़ा झूठ जो हम सबको स्कूल में पढ़ाया गया


आज से लगभग 500 साल पहले, वास्को डी गामा हिंदुस्तान आया था . इतिहास की चोपड़ी में, इतिहास की किताब में हमसब ने पढ़ा होगा कि सन. 1498 में मई की 20 तारीख को वास्को डी गामा हिंदुस्तान आया था. इतिहास की चोपड़ी में हमको ये बताया गया कि वास्को डी गामा ने हिंदुस्तान की खोज की, पर ऐसा लगता है कि जैसे वास्को डी गामा ने जब हिंदुस्तान की खोज की, तो शायद उसके पहले हिंदुस्तान था ही नहीं. हज़ारो साल का ये देश है, जो वास्को डी गामा के बाप दादाओं के पहले से मौजूद है इस दुनिया में. तो इतिहास कि चोपड़ी में ऐसा क्यों कहा जाता है कि वास्को डी गामा ने हिंदुस्तान की खोज की, भारत की खोज की. और मै मानता हु कि वो एकदम गलत है.
इस विडियो में देखिए पूरी सच्चाई >>
वास्को डी गामा ने भारत की कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान की भी कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान पहले से था, भारत पहले से था, वास्को डी गामा यहाँ आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए, एक बात और जो इतिहास में, मेरे अनुसार बहुत गलत बताई जाती है कि वास्को डी गामा एक बहूत बहादुर नाविक था, बहादुर सेनापति था, बहादुर सैनिक था, और हिंदुस्तान की खोज के अभियान पर निकला था, ऐसा कुछ नहीं था, सच्चाई ये है कि पुर्तगाल का वो उस ज़माने का डॉन था, माफ़िया था. जैसे आज के ज़माने में हिंदुस्तान में बहूत सारे माफ़िया किंग रहे है, उनका नाम लेने की जरुरत नहीं है, क्योकि मंदिर की पवित्रता ख़तम हो जाएगी, ऐसे ही बहूत सारे डॉन और माफ़िया किंग १५ वी सताब्दी में होते थे यूरोप में. और 15 वी. सताब्दी का जो यूरोप था.
वहां दो देश बहूत ताकतवर थें उस ज़माने में, एक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल. तो वास्को डी गामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था. 1490 के आस पास से वास्को डी गामा पुर्तगाल में चोरी का काम, लुटेरे का काम, डकैती डालने का काम ये सब किया करता था. और अगर सच्चा इतिहास उसका आप खोजिए तो एक चोर और लुटेरे को हमारे इतिहास में गलत तरीके से हीरो बना कर पेश किया गया. और ऐसा जो डॉन और माफ़िया था उस ज़माने का पुर्तगाल का ऐसा ही एक दुसरा लुटेरा और डॉन था, माफ़िया था उसका नाम था कोलंबस, वो स्पेन का था. तो हुआ क्या था, कोलंबस गया था अमेरिका को लुटने के लिए और वास्को डी गामा आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए. लेकिन इन दोनों के दिमाग में ऐसी बात आई कहाँ से, कोलंबस के दिमाग में ये किसने डाला की चलो अमेरिका को लुटा जाए, और वास्को डी गामा के दिमाग में किसने डाला कि चलो भारतवर्ष को लुटा जाए. तो इन दोनों को ये कहने वाले लोग कौन थे? अतुल भाई जो बता रहे थे, वही बात मै आपसे दोहरा रहा हु.
हुआ क्या था कि 14 वी. और 15 वी. सताब्दी के बीच का जो समय था, यूरोप में दो ही देश थें जो ताकतवर माने जाते थे, एक देश था स्पेन, दूसरा था पुर्तगाल, तो इन दोनों देशो के बीच में अक्सर लड़ाई झगडे होते थे, लड़ाई झगड़े किस बात के होते थे कि स्पेन के जो लुटेरे थे, वो कुछ जहांजो को लुटते थें तो उसकी संपत्ति उनके पास आती थी, ऐसे ही पुर्तगाल के कुछ लुटेरे हुआ करते थे वो जहांज को लुटते थें तो उनके पास संपत्ति आती थी, तो संपत्ति का झगड़ा होता था कि कौन-कौन संपत्ति ज्यादा रखेगा. स्पेन के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी या पुर्तगाल के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी. तो उस संपत्ति का बटवारा करने के लिए कई बार जो झगड़े होते थे वो वहां की धर्मसत्ता के पास ले जाए जाते थे. और उस ज़माने की वहां की जो धर्मसत्ता थी, वो क्रिस्चियनिटी की सत्ता थी, और क्रिस्चियनिटी की सत्ता में 1492 के आसपास पोप होता था जो सिक्स्थ कहलाता था, छठवा पोप. तो एक बार ऐसे ही झगड़ा हुआ, पुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओ के बीच में, और झगड़ा किस बात को ले कर था?
झगड़ा इस बात को ले कर था कि लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए. तो उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया. आदेश जारी किया, एक नोटिफिकेशन जारी किया. सन 1492 में, और वो नोटिफिकेशन क्या था? वो नोटिफिकेशन ये था कि १४९२ के बाद, सारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटा, और दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा. तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम स्पेन करेगा. ये आदेश 1492 में पोप ने जारी किया. ये आदेश जारी करते समय, जो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बांटे, और उन दोनों हिस्सों को लुटने के लिए दो अलग अलग देशो की नियुक्ति कर दे? स्पैन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटो, पुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो और 1492 में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एग्जिस्ट करता है.
ये क्रिस्चियनिटी की धर्मसत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है उसका एक अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने मान लिया कि सारी दुनिया तो हमारी है और इस दुनिया को दो हिस्सों में बांट दो पुर्तगाली पूर्वी हिस्से को लूटेंगे, स्पेनीश लोग पश्चिमी हिस्से को लूटेंगे. पुर्तगालियो को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लुटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लुट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया था. क्योकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है. और उसी लुट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया. इतिहास बताता है कि 1492 में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और 1498 में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचा

Monday, October 28, 2019

Rajiv Dixit ji_अगर ये राजा ना होते तो 100 साल पहले ही आजाद हो जाता भारत ! एक मुख्यमंत्री भी इन्ही में से एक है


दोस्तों आपको तो पता ही होगा कि सन 1857 में अंग्रेजो के खिलाफ देश में बहुत बड़ी क्रांति हुई थी। उस क्रांति में पुरे भारत में 3 लाख 65 हजार अंग्रेज मारे गए थे। कुछ 2-4 अंग्रेज जिन्दा बच गए फिर वो भागकर किसी तरह London पहुच गए। और उन्होंने भागने के लिये पहले अपने पुरे शरीर को काला किया ताकि वो भारतवासी लगे। उन्होंने अंग्रेजो की संसद में सारी कहानी सुनाई कि भारत में तो विद्रोह हो गया है बगावत हो गयी है। इसके बाद अंग्रेजो की संसद में एक प्रशन आया कि आगे कभी की ऐसा कोई विद्रोह ना हो, इसके लिये क्या क्या करना चाहिए। तो कई लोगो ने अपने प्रेसिडेंट से कहा कि दुबारा से ऐसा ना हो इसके लिये क्या करना चाहिए। तो वहा के प्रेसिडेंट ने कहा कि तुम चिंता ना करो हमारे भारत के कई मित्र है उनकी मदद से हम फिर भारत में जायेंगे। अब आप ये सोच रहे होंगे कि उनके मित्र और दोस्त कौन??? हमारे लिये जो गद्दार वो अंग्रेजो के लिये मित्र और दोस्त। क्या आपको पता है इस देश में कई परिवारों को अंग्रेजो ने रायबहादुर, सर, नाईट हुड की पदवी दे रखी थी। और ये पदवी लेने वाले सब परिवार गद्दार निकले और इन्होने अंग्रेजो की खूब मदद की।

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सबसे बड़ा परिवार जिसने 1857 के विद्रोह के बाद जिसने अंग्रेजो की मदद की वो है पटियाला का परिवार जो आज भी जिन्दा है और उसी परिवार का एक व्यक्ति मुख्यमंत्री बनता रहता है पंजाब में। पटियाला के नवाब खानदान ने 1857 की क्रांति के बाद क्रांतिकारियों की मदद नहीं की बल्कि अंग्रजो की मदद की। और उन्होंने अंग्रेजो को एक पत्र लिखा जिसकी कॉपी राजीव दीक्षित जी के पास थी, जो समय आने पर वो पुरे देश को दिखाने वाले थे। उस पत्र में वो नवाब लिखता है कि “आप आईये और भारत को दुबारा गुलाम बनाइये मै आपको 20 हजार सैनिक दूंगा और 20 करोड़ स्वर्ण मुद्राए दूंगा, आप फिर भारत में आकर अपना राज्य स्थापित करिए”। तो पटियाला के नवाब के कहने पर अंग्रेज आ गए।

इसी तरह हरियाणा के जींद का एक नवाब था इसने अंग्रेजो की मदद की। फिर ग्वालियर का ये जो सिंधिया खानदान है इसने अंग्रेजो की बहुत मदद की। ऐसे ही हैदराबाद का एक सलारजन खानदान है जिसको हैदराबाद का निजाम भी कहते थे। ऐसे कुल मिलकर 10-12 परिवार थे जिन्होंने अंग्रेजो को स्वर्ण मुद्राए दी और भारत के क्रांतिकारियों से लड़ने के लिये सैनिक भी दिए। तो इन सब राजाओ की मदद से अंग्रेजो ने फिर से इस देश में परिवेश किया और क्रांतिकारियों की कत्लेआम शुरू कर दिया पुरे देश में।

1 सितम्बर 1857 से लेकर 1 नवम्बर 1858 तक हिन्दुतान से करीब 7 लाख क्रांतिकारियों का अंग्रेजो ने कतल करवा दिया। और कतल भी कैसे किया अगर आप सुनेगे तो हैरान हो जायेंगे। एक बिठुर नाम का छोटा सा शहर है कानपूर के नजदीक वहा के 2 बड़े क्रन्तिकारी थे नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे। ये दोनों क्रांतिकारियों के शहर के 24 हजार लोगो को गोलियों और तलवार से काटकर मार दिया। तीन महीने के छोटे -2 बच्चे से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक किसी को नहीं बक्सा। उन सबका अपराध कोई भी नहीं था बस यही अपराध था कि वो लोग नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे के शहर में रहते थे। तो अंग्रेज कहते थे ये सब हमारे खिलाफ भगावत करेंगे और सब क्रन्तिकारी बनगे इसलिये सबको कतल करो और ये कत्लेआम अंग्रेजो ने भारत के पटियाला नवाब (राजा), जींद का राजा, गवालियर का सिंधिया खानदान, इन सबके सैनिको की मदद से किया। और ये सारे कत्लेआम पुरे देश में हुए जिसके कारण अंग्रेजो की सरकार फिर से स्थापित हो गई। अंग्रेजो की सरकार स्थापित होने के पश्चात् 1 नवम्बर 1858 को क्वीन विक्टोरिया ने एक ऐलान किया जो भारत के बड़े बड़े अखबारों में छपा। उस ऐलान के कहा गया कि आज के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार नहीं चलेगी कानून की सरकार चलेगी और वो सब कानून अंग्रेजो की संसद बनाएगी और उसी के आधार पर ये देश चलाया जायेगा। अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में कानून बनाने के लिये बहस ये हुई कि कानून ऐसे बनाए जाये कि सभी भारतवासी कभी भी दुबारा से खड़ा ना हो सके और अंग्रेजो के खिलाफ बगावत ना कर सके।

अंग्रेजो के खिलाफ जो पहली बगावत थी वो शास्त्र बगावत थी उसमे हतियारो का इस्तेमाल हुआ था। इसके बाद अंग्रेजो ने सबसे पहला कानून ये बनाया कि घर में हथियार वही रख सकेगा, जिसके पास लाइसेंस होगा। जिसके पास नहीं होगा वो हथियार नहीं रख सकता। तो अंग्रेजो ने “Licencing of Arms Act” पहला कानून बनाया और इस कानून के आधार पर ये किया गया कि घर घर की तलासियाँ ली गई कि किसके घर में बन्दुक है किसके घर में हसिया है, छुरा है, चाकू है सब अंग्रेजो ने छीन लिए क्योकि अंग्रेजो को इन्ही हतियारो से डर था कि कही ये लोग फिर से बगावत ना कर दे। और एक बार अगर भारतवासियों का हथियार छीन गए तो भारतवासी बहुत कमजोर हो गए और वो कमजोरी इतनी भारी पड़ी कि अगले 90 साल तक फिर हमें अंग्रेजो की गुलामी सहनी पड़ी। और ये कानून आजादी के करीब 70 साल बाद आज भी चल रहा है। आपको तो पता ही होगा हथियार वही रख सकता है जिसके पास लाइसेंस होगा और लाइसेंस देने का कम सरकार करती है पहले गोरे अंग्रेजो की सरकार यव काम करती थी अब काले अंग्रेजो की सरकार ये काम कर रही है।

दूसरा एक कानून अंग्रेजो ने बनाया इंडियन पुलिस एक्ट। कभी भी भारतवासी अंग्रेजो के खिलाफ कुछ ना करे उसके लिये उनको मारकर, पीटकर, दबाकर, कुचलकर सबकी कण्ट्रोल में रखने के लिये एक एजेंसी बनाई जिसको पुलिस कहा जाता है। क्या आपको पता है 1858 से पहले इस देश में कोई पुलिस नहीं थी। किसी भी राजा ने पुलिस नहीं रखी हा आर्मी रखी थी लेकिन पुलिस नहीं रखी। क्योकि पुलिस की जरुरत नहीं थी अपने ही लोगो को मारना पीटना, दबाना, धमकाना ये काम कोई नहीं करता है। कोई भी राजा अपनी प्रजा पर ये अत्याचार नहीं करेगा। लेकिन अंग्रेजो ने पुलिस बनाई जिसका नाम रखा “इंडियन पुलिस एक्ट” और उसमे जो आधार दिया गया वो ये कि हर पुलिस वाले को Right to offence होगा लेकिन किसी भी भारत के नागरिक को Right to Defence नहीं होगा। मतलब ये कि कोई भी पुलिस अधिकारी आपको पकड़कर लाठी से मारने लगे तो आपको लाठी पकड़ने का भी अधिकार नहीं होगा, आप सिर्फ पिटते रहिये। और अगर अपने उसकी लाठी पकड़ ली तो केस आपके खिलाफ बनेगा कि अंग्रेज अधिकारी को ड्यूटी करने से आपने रोका। और यही कानून आजादी के करीब 70 साल बाद भी चल रहा है

अंग्रेजो ने ऐसा ही एक कानून बनाया इंडियन सिविल सर्विसेज एक्ट। हमारे यहा ग्राम पंचायत होती थी जो गाँव में हर करी करती थी जैसे टैक्स लगाना या उसको गाँव के विकास के लिये खर्च करना। ये सब अधिकार छिनकर कलेक्टर को दे दिए। और उस पोस्ट को DM यानी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या कलेक्टर कहते है और ये हिज कानून के तहत हुआ उसको इंडियन सिविल सर्विसेज एक्ट कहते है। ये कानून भी अभी तक वैसे का वैसा ही चल रहा है।

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